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पंच शक्तियों का ओढ़ के अम्बर

Devaki Nandan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अरे, तुम तो ब्रह्मांड का हिस्सा हो,
        
                                                    
                            
कोई भारी बोझिल तत्व नहीं,
पहचानों अपनी उस ऊर्जा को,
जिसका कोई अंत नहीं।

सीखो जरा उन ऊँचे शिखरों से,
जो मौन रह कर भी लड़ते हैं,
पतझड़ के सूखे पत्तों से,
नए अंकुर फिर निकलते हैं।

कंक्रीट की छाती चीर कर भी,
पीले फूलों ने हँसना सीखा है,
विपरीत हवाओं के आगे,
कभी पहाड़ों को झुकते देखा है?

मन, वचन और कर्म को मिलाकर,
एक नया यौगिक तैयार करो,
जो बिखर रहा है भीतर ,
उस व्यवस्था से अब प्यार करो।

पंच शक्तियों का ओढ़ के अम्बर,
खुद अपनी राह का दीप बनो,
तुम सिर्फ एक शरीर नहीं,
इस सृष्टि की सबसे पावन रूह बनो।
-देवकी नन्दन
एक घंटा पहले
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