तुम्हारे वास्ते क्या क्या न किया,
और तुम को कभी ख़फ़ा न किया।
दूर होकर मेरे आस पास हो तुम,
तुम्हें दिल से कभी जुदा न किया।
तुम तसव्वुर में साथ रहती हो,
ख़याल किस पल तुम्हारा न किया।
वस्ल के लम्हे याद करते हैं हम,
इस तरह ख़ुद को तन्हा न किया।
तुम्हारी नज़रों से पी लेते हैं,
मयकदे की तरफ रस्ता न किया।
शमीम तुम ही हो मेरी मंज़िल,
कभी भी तुम से फ़ासला न किया।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"