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तुम तसव्वुर में साथ रहती हो

                
                                                         
                            तुम्हारे वास्ते क्या क्या न किया,
                                                                 
                            
और तुम को कभी ख़फ़ा न किया।

दूर होकर मेरे आस पास हो तुम,
तुम्हें दिल से कभी जुदा न किया।

तुम तसव्वुर में साथ रहती हो,
ख़याल किस पल तुम्हारा न किया।

वस्ल के लम्हे याद करते हैं हम,
इस तरह ख़ुद को तन्हा न किया।

तुम्हारी नज़रों से पी लेते हैं,
मयकदे की तरफ रस्ता न किया।

शमीम तुम ही हो मेरी मंज़िल,
कभी भी तुम से फ़ासला न किया।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
43 मिनट पहले

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