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लब तेरे मुस्कुराते हैं बदल जाता है ये समाँ

dev sachdeva

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तन्हाई में तेरी आवाज़-ए-पा मा'लूम होती है,
        
                                                    
                            
ज़ुल्मते-शब में तेरी ज़िया मा'लूम होती है।

तुझे महसूस करता हूँ तुझ से दूर होकर भी,
हरेक साँस में तेरी ही सदा मा'लूम होती है।

तेरे ख़याल से मेरा जुदा होना नहीं मुमकिन,
मैं नाम लूँ तेरा लब पर दुआ मा'लूम होती है।

खिल गए फूल हर तरफ, बहार आ गई जैसे,
तेरी ख़ुशबू से महकी ये फ़िज़ा मा'लूम होती है।

लब तेरे मुस्कुराते हैं बदल जाता है ये समाँ,
बात करती है तो दिलकश ग़िना मा'लूम होती है।

तेरी तारीफ़ में जब भी ग़ज़ल-सराई करता हूँ,
मेरे अशआर में तेरी ही अदा मा'लूम होती है।

"शमीम" तेरे इश्क में उस मक़ाम पर हैं हम,
मेरे आलम में है तेरी ही सदा मा'लूम होती है।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
3 घंटे पहले
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