एक सूखा हुआ शजर देखते हैं,
क्या सहा उस ने कहर देखते हैं।
लाखों तारों में भी अकेला सा है,
चाँद को तन्हा रात भर देखते हैं।
सभी के अपने-अपने मसले हैं,
हम परेशाँ सा हर बशर देखते हैं।
किसने लगाई है आग नफ़रत की,
रोज़ जलता हुआ शहर देखते हैं।
ज़िन्दा हैं लोग, लबों पे ताले हैं,
एक ख़ामोशी का मंज़र देखते हैं।
सभी दुकानें सजा कर बैठे हैं,
हर एक शख़्स सौदागर देखते हैं।
न वो समझे मिरे जज़्बात "शमीम",
अपनी आहों को बेअसर देखते हैं।
-देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"