कोई हमराह साथ आया तो होता,
हमें मंज़िल तक पंहुचाया तो होता।
हमसफ़र साथ छोड़ कर बिछड़ गए,
रास्ता हम को दिखलाया तो होता।
बदगुमानी अगर तुम को थी कोई,
एक बार उसको सुलझाया तो होता।
हमसे जो वादे किए थे तुम ने कभी,
उनको शिद्दत से निभाया तो होता।
मोहब्बत और फिर तर्क-ए-तअल्लुक,
वज्ह-ए-जफ़ा भी बतलाया तो होता।
नहीं होते गर इस क़दर ये अंधेरे,
"शमीम" मेरे साथ साया तो होता।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"