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इन्साँ नज़र नहीं आता

dev sachdeva

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हमें दग़ा और फ़रेब का हुनर नहीं आता,
        
                                                    
                            
नसीब इसलिए भी बहरा-वर नहीं आता।

जो एक बार हाथ छोड़कर चला गया वो,
लाख कोशिश करो लौट कर नहीं आता।

एक ज़माना था ख़तों का इंतज़ार करते थे,
अब तो घर पर कोई पैग़ाम-बर नहीं आता।

बिछड़कर तुम से हम को ये अहसास हुआ,
जो पीछे छूट गया वो रहगुज़र नहीं आता।

जिधर देखो वहाँ पर भीड़ नज़र आती है,
मगर इस भीड़ में इन्साँ नज़र नहीं आता।

"शमीम" हमसफ़र सब राह में बिछड़ते गए,
साथ निभाने कोई भी उम्र भर नहीं आता।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
2 महीने पहले
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