विज्ञापन

बिखराते हैं ख़ुशबू, टूट कर बिखरते हैं।

dev sachdeva

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            खिलते हुए ग़ुंचों से गुलसिताँ सँवरते हैं
        
                                                    
                            
बिखराते हैं ख़ुशबू, टूट कर बिखरते हैं।

होती नहीं सहर नसीब में चराग़ों के,
वो रात भर कितने तूफ़ानों से गुज़रते हैं।

गर्दिश-ए-दौराँ से गुज़र कर जो चलते रहें,
मंज़िलों को हासिल बेशक़ वही करते हैं।

पानी में उतरने का हौसला जो रखते हैं,
चीर कर तलातुम को पार वो उतरते हैं।

एक नई राह वही लोग बना पाते हैं,
जो बहुत दुश्वारियों के दौर से गुज़रते हैं।

याद रह जाते हैं वही लोग जहाँ में "शमीम"
औरों के लिए जो जीते हैं और मरते हैं।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
2 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

priyanka samariya

8 कविताएं

View Profile

Ankit Kumar

10819 कविताएं

View Profile

Kanojiya Manisha

10 कविताएं

View Profile