खिलते हुए ग़ुंचों से गुलसिताँ सँवरते हैं
बिखराते हैं ख़ुशबू, टूट कर बिखरते हैं।
होती नहीं सहर नसीब में चराग़ों के,
वो रात भर कितने तूफ़ानों से गुज़रते हैं।
गर्दिश-ए-दौराँ से गुज़र कर जो चलते रहें,
मंज़िलों को हासिल बेशक़ वही करते हैं।
पानी में उतरने का हौसला जो रखते हैं,
चीर कर तलातुम को पार वो उतरते हैं।
एक नई राह वही लोग बना पाते हैं,
जो बहुत दुश्वारियों के दौर से गुज़रते हैं।
याद रह जाते हैं वही लोग जहाँ में "शमीम"
औरों के लिए जो जीते हैं और मरते हैं।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
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