वो दो चार दिन दौर था जो ख़ुशी का,
सबब बन गया मेरी अफ़सुर्दगी का।
ग़म-ए-हिज़्र में इस क़दर ग़र्क हैं हम,
तेरे बाद फिर दिल हुआ न किसी का।
कभी तेरी नज़रों से हमने जो पी थी
उतर ही गया वो असर मयकशी का।
बदल जाते हैं रिश्ते बस एक पल में,
कोई भी नहीं है यहाँ पर किसी का।
ख़ता हो गई एक पत्थर को पूजा,
जिसे कुछ असर न हुआ बंदगी का।
"शमीम" सब हैं बेमानी उल्फ़त के वादे,
बना खेल अब तो ये है दिल्लगी का।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम'