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फ़स्ले-गुल एक बार आने दो

dev sachdeva

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            चमन में फूल कुछ खिलाने दो,
        
                                                    
                            
फ़िज़ा ये दिलनशीं बनाने दो।

तीरग़ी चार सू फैली हुई है,
एक शम'अ हमें जलाने दो।

किस सबब है ये अफ़सुर्दगी,
अपने चेहरे को मुस्कुराने दो।

जो तेरा है तुझे मिल जाएगा,
न हो हासिल तो भूल जाने दो।

ख़िज़ा का दौर गुज़र जाएगा,
फ़स्ले-गुल एक बार आने दो।

"शमीम" रूठे गर कोई अपना,
ख़फ़ा होकर उसे न जाने दो।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
3 घंटे पहले
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