सत्य क्या है?
सत्य क्या है...?
जो दिखाई देता है,
क्या वही सत्य है?
या जो आँखों से छिपा रहता है,
वही सबसे बड़ा सत्य है?
सत्य वह नहीं
जो भीड़ कहती है,
सत्य वह है
जो अकेले में भी
अंतरात्मा स्वीकार करती है।
कभी सत्य कड़वा होता है,
इसलिए लोग उससे दूर भागते हैं,
और कभी झूठ इतना सुंदर होता है
कि लोग उसे ही जीवन मान लेते हैं।
सत्य न राजा का होता है,
न गरीब का,
न धर्म का,
न किसी जाति का—
सत्य बस सत्य होता है,
उसका कोई पक्ष नहीं होता।
समय बदलता है,
लोग बदलते हैं,
रिश्ते बदल जाते हैं,
चेहरे बदल जाते हैं...
लेकिन जो सच में घट चुका है,
वह इतिहास बनकर
हमेशा जीवित रहता है।
हम दूसरों से झूठ बोल सकते हैं,
दुनिया से भी छिप सकते हैं,
मगर अपने भीतर बैठे उस इंसान से
कैसे बचेंगे
जो हर रात हमसे पूछता है—
“आज तुमने अपने साथ कितना सच बोला?”
शायद सत्य यही है...
कि जीवन हमारा है,
लेकिन जीवन पर अधिकार हमारा नहीं।
हम जिसे अपना कहते हैं,
वह भी एक दिन छूट जाता है।
हम जिस शरीर पर गर्व करते हैं,
वह भी मिट्टी में मिल जाता है।
हम जो नाम कमाते हैं,
वह भी समय की धूल में खो सकता है।
फिर बचता क्या है?
हमारे कर्म।
हमारी सच्चाई।
और किसी के दिल में छोड़ी हुई
हमारी इंसानियत।
इसलिए मैंने जाना—
सत्य को साबित करने की जरूरत नहीं होती,
उसे बस जीना पड़ता है।
क्योंकि—
झूठ को आवाज़ चाहिए,
सत्य को सिर्फ समय।
-देव कुमार पटेल