रोटी का हिसाब
एक थाली में रोटी बची है आधी,
हमने कहा - मन भर गया है ज्यादा,
उधर गली के मोड़ पर कोई,
सपनों में रोटी गिन रहा है आधा।
हम फेंक देते हैं हँसते-हँसते,
जो किसी की दुआ बन सकती थी,
वो दाना जो धरती ने तप कर दिया,
किसी की भूख मिटा सकती थी।
खेत में किसान का पसीना है इसमें,
माँ के हाथों की ममता भी है,
धूप, बारिश, मिट्टी की कहानी है,
फिर क्यों इसमें इतनी लापरवाही है?
उतना ही लो थाली में, जितना खा सको,
अन्न को कचरा मत बनाओ,
बचा है तो किसी और को खिलाओ,
भूख का थोड़ा कर्ज चुकाओ।