विज्ञापन

रोटी का हिसाब

Dev Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            रोटी का हिसाब
        
                                                    
                            

एक थाली में रोटी बची है आधी,
हमने कहा - मन भर गया है ज्यादा,
उधर गली के मोड़ पर कोई,
सपनों में रोटी गिन रहा है आधा।

हम फेंक देते हैं हँसते-हँसते,
जो किसी की दुआ बन सकती थी,
वो दाना जो धरती ने तप कर दिया,
किसी की भूख मिटा सकती थी।

खेत में किसान का पसीना है इसमें,
माँ के हाथों की ममता भी है,
धूप, बारिश, मिट्टी की कहानी है,
फिर क्यों इसमें इतनी लापरवाही है?

उतना ही लो थाली में, जितना खा सको,
अन्न को कचरा मत बनाओ,
बचा है तो किसी और को खिलाओ,
भूख का थोड़ा कर्ज चुकाओ।
6 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Dn Chaubey

7095 कविताएं

View Profile