आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

रोटी का हिसाब

                
                                                         
                            रोटी का हिसाब
                                                                 
                            

एक थाली में रोटी बची है आधी,
हमने कहा - मन भर गया है ज्यादा,
उधर गली के मोड़ पर कोई,
सपनों में रोटी गिन रहा है आधा।

हम फेंक देते हैं हँसते-हँसते,
जो किसी की दुआ बन सकती थी,
वो दाना जो धरती ने तप कर दिया,
किसी की भूख मिटा सकती थी।

खेत में किसान का पसीना है इसमें,
माँ के हाथों की ममता भी है,
धूप, बारिश, मिट्टी की कहानी है,
फिर क्यों इसमें इतनी लापरवाही है?

उतना ही लो थाली में, जितना खा सको,
अन्न को कचरा मत बनाओ,
बचा है तो किसी और को खिलाओ,
भूख का थोड़ा कर्ज चुकाओ।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
5 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर