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दिल मनुज प्रेम पहचानेंगे

Dev Karan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            वो खुद को भी नहीं जानते,
        
                                                    
                            
वो मुझ को क्या पहचानेंगे,
उनको कद्र नहीं है हीरे की,
वो लोग राख को ही छानेंगे।

वो दोषारोपण करते रहते,
वो नुक्ताचीनी करते ही रहते,
वो भले काम बाधा बनते रहे,
वो इंसान को कैसे जानेंगे।

उनका ज़ोर नहीं घर पर चलता,
वो समाज के ठेकेदार बनें,
जो मांग मांग कर काम चलाएं,
वो मेहनत को कैसे मानेंगे।

जो घर घर घूम के आग लगाएं,
वो क्या घर को मंदिर मानेंगे,
जो अपनों को अपनों से तोड़े,
वो घर का मर्म ना जानेंगे।

इन लोगों से तुम दूर भले,
ये इंसान नहीं ये विषधर हैं,
जोड़ो दिल को दिल से अरविन्द,
दिल मनुज प्रेम को पहचानेंगे।


देवकरण गंडास "अरविन्द"


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