सज रही थी आकृति में अपनी,
मेरे ममता की मधुर मुस्कान हो।
बीते दिनों में खूब सिहर रही थी,
जीवन साथी तूं नव अरमान हो।।१।।
पल पल यातना में सुलग रही मैं,
पग पग पथ की मेरी पहचान हो।
मातृत्व हृदय तो निखर रही अब,
मेरे हो, अपने हो नव परिधान हो।।२।।
हे शुभे! श्वेत श्याम परिपूरित तन,
अप्रसन्न मन के नवल उत्थान हो।
विशाल विस्तृत उर में सुगंध लिए,
प्रसन्न मन की प्रसन्न अरमान हो।।३।।
मैं सुनसान में जब भटक रही थी,
उस अरण्य के तुम्हीं परिधान हो।
पलकर उजड़े मन के अंतःकरण,
मेरे ममता की मधुर मुस्कान हो।।४।।
खिल उठो! हर्षित मन आंगन में,
विस्तृत वक्ष स्थल के नव गान हो।
मैं अनन्त लहरों में लहर रही थी,
मेरे सुखद स्वप्न के चिर महान हो।।५।।
-देवनन्दन कुमार, "बरहथिया"