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विजय दिवस

deepali kalra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पढ़ती हूं सन 1971 के वीरों की गाथा, गर्व से सीना फूल सा जाता है,
        
                                                    
                            
रहने वाली हूं इस वीर भूमि का, इस बात पर गर्व से मस्तक उठता जाता है।
जब भी पढ़ी मैंने वीरों की कुर्बानियां, दिल हुक हुक कर रोया है,
उजड़ गए वीरों के परिवार, इस बात पर दिल कुछ खोया खोया है।
बिखर गयी दूल्हनों की चूड़ियाँ, सुनी हो गयीं हजारों कलाइयाँ,
मिट गए माथे से सिंदूर, सुनी हो गयी माताओं की गोदियाँ।
धरती पर पट गए लाशों के अम्बार, खून से जमीं हो गयी लाल,
भारत पाकिस्तान के युद्ध में खो गए, भारत भूमि के कई लाल।
आज 16 दिसंबर के दिन हम, मानते हैं विजय दिवस,
आज ही के दिन हम मनाते हैं, भारत की अखंडता का यश।
नमन करती हूं आज देश के वीरों को, राष्ट्र के शूरवीरों को,
नमन करता है पूरा देश आज, युद्ध में शहीद सभी रणबाँकुरों को।
चमक रहे दूर गगन में, बनकर शहीद सब चाँद और तारे,
गिरती जमीन पर उनकी किरणेँ, हर घर के द्वारे द्वारे।
इन्ही शहीदों ने बहाया था युद्ध में, बेखौफ़ अपना रक्त लाल,
उन्हीं की शहादत की बदौलत आज, हम जी रहे ज़िन्दगी खुशहाल।
नमन करती हूं शहीदों के परिवारों को, भेज दिए युद्ध में अपने लाल,
टूट पड़े थे जान हथेली में लेकर, किया था दुश्मनों का हाल बेहाल।
हिमालय भी कर रहा देखो, आज इन शूरवीरों को नमन,
हिन्द महासागर भी कर रहा देखो, इन वीरों को जल अर्पण।
नमन करती हूं आज, राष्ट्र की अखंडता और अस्मिता को,
नमन करती हूं आज, देश के वीरों की वीर गाथा को।
नमन करती हूं आज, हर शहीद की माता को,
नमन करती हूं आज, इन वीर पत्नियों की सौहार्दता और शालीनता को।

दीपाली कालरा
 
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