*मौन भी बोलता है*
कुछ बातें
कहने से नहीं,
सहने से समझ आती हैं…
और कुछ रिश्ते
टूटने से नहीं,
ख़ामोश होने से समझ आते हैं।
हम भी कभी
हर सवाल का जवाब रखते थे,
हर इल्ज़ाम पर सफ़ाई देते थे,
हर रिश्ते को बचाने के लिए
ख़ुद को थोड़ा-थोड़ा खो देते थे।
फिर एक दिन
दिल ने बड़े सलीके से कहा—
“दीप, हर बात समझाना ज़रूरी नहीं,
कुछ लोगों को
सिर्फ़ अपनी कहानी पर यक़ीन होता है।”
तब से
हमने ख़ामोशी को चुन लिया।
न इसलिए कि
कहने को कुछ नहीं था,
बल्कि इसलिए कि
बहुत कुछ कहकर भी
कुछ लोग सुनते नहीं।
अब किसी की बेरुख़ी पर
शिकायत नहीं होती,
किसी की बेवफ़ाई पर
शोर नहीं होता।
जो क़दर करे,
उसके लिए दिल खुला है…
जो सिर्फ़ इस्तेमाल करे,
उसके लिए दरवाज़ा ख़ामोश है।
हमने जाना है—
हर जवाब ज़ुबान से दिया जाए,
ज़रूरी नहीं।
कभी वक़्त जवाब देता है,
कभी दूरी,
और कभी हमारी ख़ामोशी
वो सब कह जाती है
जो लफ़्ज़ कह नहीं पाते।
मगर इतना याद रखना—
मौन को अहंकार मत समझना,
क्योंकि अक्सर
सबसे गहरी आवाज़
वही होती है
जो सुनाई नहीं देती।
और हाँ…
अगर कभी
मेरी ख़ामोशी तुम्हें समझ आए,
तो उसे मेरी हार मत समझना—
शायद मैंने बस
अपने भीतर के इंसान को
बहस से बचा लिया है।
सार्वजनिक मांग पर —
मौन के कुछ अनकहे अहसास,