राज-पाटन और हुकूमत भाइयों पर वार कर,
जान से बढ़कर वो अपने भाइयों से प्यार कर।
ढूँढते थे राम लक्ष्मण को विकल व्याकुल वहाँ,
रो पड़े थे आज अपनी ख़ुशियों को वो हार कर।
रख खड़ाऊँ तख़्त पर रोए भरत भी रात-दिन,
राज-पाटन को तजा भाई का बस सत्कार कर।
घर वही तीरथ है और मक्का-मदीना है वही,
रहते हैं भाई जहाँ पर दिल में सच्चा प्यार भर।
आए कोई मुश्किल या सामने तूफ़ान हो,
पार दरिया को करेंगे हाथ में बस हाथ धर।
चाहतों का इक नया 'दीपक' जलाकर प्यार का,
भाई के ही नाम अपनी ज़िंदगी को वार कर।
- दीपक प्रजापति 'अलक'