श्रम-स्वेद पोंछ इस धरती का, जब दिवस विदा होकर सोया,
तब नील निशा का जादू इस, अम्बर के आँगन में खोया।
यह तिमिर नहीं, यह थकी चेतना की गंभीर समाधि है,
यह सारी दुनिया के कोलाहल का, अंतिम महा-विसर्जन है।
धो देती हो तुम ऊँच-नीच, महलों के झूठे दंभों को,
एक समरस चादर ओढ़ाकर, सहलाती थके उमंगों को।
दिन की लिप्सा, दिन का संघर्ष, दिन की तृष्णा का हाहाकार,
सब शांत हुआ, जब खोल दिया तुमने करुणा का महाद्वार।
नक्षत्रों की ये अंजलि भर, जो बिखराया तुमने नभ पर,
वे दीप नहीं, वे जाग रहे ऋषियों के नयन हैं दिगंबर!
इस चंदा के उज्ज्वल पट पर, जो कालिमा का बिंदु अंकित,
वह दोष नहीं, वह महादेव के कण्ठ का विष है सुशोभित।
तुम छद्म मुखौटे उतार फेंक, भीतर का दर्पण लाती हो,
दिन भर जो खुद से भाग रहा, उसे खुद के पास बिठाती हो।
इतिहास लिखे जाते दिन में, पर भाग्य लिखे जाते तुममें,
सपनों के अंकुर फूट रहे, इस मूक तिमिर के ही कुमकुम में।
हे मौन असीमता! हे अनंत! तुम आदि-अंत की परिभाषा,
तुमसे ही ओजस्वी होती, कल के सूरज की नव-आशा।
जब तक तुम गर्भ न करो धारण, तब तक प्रकाश भी बंध्या है,
सृष्टि का चक्र ठहर जाए, यदि मिले न भोर को संध्या है।
तुम अंत नहीं इस सृष्टि का, तुम आदि-बीज हो जीवन का,
तुम मौन नहीं हो हे रजनी! तुम नाद हो शाश्वत नर्तन का।
मध्याह्न का वो सूर्य प्रखर भी, तेरी श्यामल कोख का स्पंदन है,
जिस भोर पर इतराती दुनिया, वो भोर तो तेरा ही अभिनंदन है।
-दीपक कुमार मिश्र