आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

निशा: सृजन का श्यामल स्पंदन

                
                                                         
                            श्रम-स्वेद पोंछ इस धरती का, जब दिवस विदा होकर सोया,
                                                                 
                            
तब नील निशा का जादू इस, अम्बर के आँगन में खोया।
यह तिमिर नहीं, यह थकी चेतना की गंभीर समाधि है,
यह सारी दुनिया के कोलाहल का, अंतिम महा-विसर्जन है।
धो देती हो तुम ऊँच-नीच, महलों के झूठे दंभों को,
एक समरस चादर ओढ़ाकर, सहलाती थके उमंगों को।
दिन की लिप्सा, दिन का संघर्ष, दिन की तृष्णा का हाहाकार,
सब शांत हुआ, जब खोल दिया तुमने करुणा का महाद्वार।
नक्षत्रों की ये अंजलि भर, जो बिखराया तुमने नभ पर,
वे दीप नहीं, वे जाग रहे ऋषियों के नयन हैं दिगंबर!
इस चंदा के उज्ज्वल पट पर, जो कालिमा का बिंदु अंकित,
वह दोष नहीं, वह महादेव के कण्ठ का विष है सुशोभित।
तुम छद्म मुखौटे उतार फेंक, भीतर का दर्पण लाती हो,
दिन भर जो खुद से भाग रहा, उसे खुद के पास बिठाती हो।
इतिहास लिखे जाते दिन में, पर भाग्य लिखे जाते तुममें,
सपनों के अंकुर फूट रहे, इस मूक तिमिर के ही कुमकुम में।
हे मौन असीमता! हे अनंत! तुम आदि-अंत की परिभाषा,
तुमसे ही ओजस्वी होती, कल के सूरज की नव-आशा।
जब तक तुम गर्भ न करो धारण, तब तक प्रकाश भी बंध्या है,
सृष्टि का चक्र ठहर जाए, यदि मिले न भोर को संध्या है।
तुम अंत नहीं इस सृष्टि का, तुम आदि-बीज हो जीवन का,
तुम मौन नहीं हो हे रजनी! तुम नाद हो शाश्वत नर्तन का।
मध्याह्न का वो सूर्य प्रखर भी, तेरी श्यामल कोख का स्पंदन है,
जिस भोर पर इतराती दुनिया, वो भोर तो तेरा ही अभिनंदन है।
-दीपक कुमार मिश्र
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर