उन्मुक्त नदी बनके बहना चाहती हूँ
नहीं अब छंदों में बंधना चाहती हूँ
क्यूँ बंधु मैं बंधनो में वर्जना में कहो
निर्मल अविरल नदी बनके ही बहो
नहीं वेदना संताप सहना चाहती हूँ
नव सृजन व गीत प्रगति के सभी को
अमृत रस से बोल मीठे हर किसी को
स्वच्छ श्वास ह्रदय में भरना चाहती हूँ
बेड़ियों को खोलने का श्रम करो तुम
शक्ति अपनी तोलने का दम भरो तुम
विश्वास अब तुम्हारा बनना चाहती हूँ
शक्ति रूपा मां भवानी भी तुम्हीं हो
रानी झांसी और सरोजिनी तुम्हीं हो
स्वपन सच करना तुम्हारा चाहती हूँ
कांच की गुड़िया नहीं बनना मुझे अब
टूट कर भी नहीं बिखरना है मुझे अब
कुंदन बनकर अब निखरना चाहती हूँ
उन्मुक्त नदी बनके बहना चाहती हूँ
नहीं अब छंदों में बंधना चाहती हूँ
क्यूँ बंधु मैं बंधनो में वर्जना में कहो
निर्मल अविरल नदी बनके ही बहो
नहीं वेदना संताप सहना चाहती हूं
नाम- दीपा संजय *दीप*
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