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मैं नहीं छंदों में बंधना चाहती हूँ

Deepa Gupta

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उन्मुक्त नदी बनके बहना चाहती हूँ
        
                                                    
                            
नहीं अब  छंदों में बंधना चाहती हूँ
क्यूँ बंधु मैं बंधनो में वर्जना में कहो
निर्मल अविरल नदी बनके ही बहो
नहीं वेदना संताप सहना चाहती हूँ

नव सृजन व गीत प्रगति के सभी को
अमृत रस से बोल मीठे हर किसी को
स्वच्छ श्वास ह्रदय में भरना चाहती हूँ

बेड़ियों को खोलने का श्रम करो तुम
शक्ति अपनी तोलने का दम भरो तुम
विश्वास अब तुम्हारा बनना चाहती हूँ

शक्ति रूपा मां भवानी भी तुम्हीं हो
रानी झांसी और सरोजिनी तुम्हीं हो
स्वपन सच करना तुम्हारा चाहती हूँ

कांच की गुड़िया नहीं बनना मुझे अब
टूट कर भी नहीं बिखरना है मुझे अब
कुंदन बनकर अब निखरना चाहती हूँ

उन्मुक्त नदी बनके बहना चाहती हूँ
नहीं अब छंदों में बंधना चाहती हूँ
क्यूँ बंधु मैं बंधनो में वर्जना में कहो
निर्मल  अविरल नदी बनके ही बहो
नहीं वेदना संताप सहना चाहती हूं

नाम- दीपा संजय *दीप*

-हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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