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सही तो नहीं

Deep Shikha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सही तो नहीं
        
                                                    
                            
बड़ी सरल दिखती हो तुम, मगर हम तो नहीं,
तुम्हें परवाह इस समाज की,पर मुझे तो नहीं।
तुम ठहरी रस्मों की पुजारन , मैं इसके खिलाफ भी नहीं,
पर स्वर्ण जंजीरों की मंजूरी, तुम्हीं बोलो! सही तो नहीं।।
हम थोड़े बदमिजाज ठहरें, मगर ऐसे हीं सही,
बेड़ियों के बन्धन तोड़ना, इतना आसान भी नहीं ।
समाज के ठेकेदारों से रार, मेरा कोई शौक तो नहीं,
पर सिर नवाकर सबकुछ चुपचाप मान लेना, मेरी गरिमा के अनुकूल भी नहीं।।
संस्कारों और रिवाजों के नाम पर,जो थोपते हैं अपनी मनमर्जी,
उनकी यूं फरमांबरदारी करना ,मेरे संस्कार तो नहीं।
ब्रह्मभोज हो या विवाह, क्यों आसमान से ऊंचा खर्च,
खून पसीने की गाढ़ी कमाई है,कोई खैरात तो नहीं।।
मान लो ये सती प्रथा ,खत्म हीं न हुई होती,
तो क्या बेटियां हमारी अब भी ,जलती चिता में सोती।
कल्पना मात्र से हीं ,क्यों नहीं खौलता है खून तुम्हारा,
बिना सोचें कुछ भी मानते चलना, कहीं घातक तो नहीं।।
क्या कोई चलन पुराना होने मात्र से हीं सही माना जाएगा,
या उसके फलाफल का परीक्षण,उचित मानक पर भी किया जाएगा।
क्यों नहीं समझते लोग, कि ये चलन हमने हीं बनाए थें,
लकीर का फकीर होना भी, कोई समुचित तो नहीं ।।
कब तक यूं खण्डित रहोगी , दायित्वों के नाम पर ,
काया नहीं इंसान बनो , मृदुलता को त्याग कर ।
शिक्षा नौकरी या व्यापार, हक तो तुम्हारा भी है इन पर
और अपने हक पर हक जताना , सच कहूं तो बुरा भी नहीं।।
-दीप शिखा पाण्डेय
एक घंटा पहले
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