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गरीब की व्यथा

Deep Bajaj

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            भटक आया आज फिर वो बाज़ार की सड़कों पे
        
                                                    
                            
भूख मिटाने का बोझ टांगे हुए अपने कंधों पे
सोच के निकला था आज तो दो वक्त की रोटी कमा कर लाऊंगा
क्या पता था कि ठोकरें खा कर वापिस आऊंगा
खाली जेब देख कर घर लौटने की हिम्मत न हुई
क्या कहूंगा बच्चों से की आज फिर कुछ भी कमाई न हुई
समझ नहीं आता कि भगवान की बनाई इस दुनिया में इंसान तो है पर इंसानियत क्यों नहीं
किसी का दुख दर्द महसूस कर सके ऐसा किसी के पास दिल ही नहीं
आज मेरा बुरा वक्त है तो क्या हुआ कल शायद अच्छा आएगा
मुझे धक्का दे कर भगाने वाले ऊपरवाले को क्या मुंह दिखाएगा
मैं तो दो वक्त की रोटी कमाने निकला था खैरियत की खाने नहीं
गरीब जरूर हूं साहब पर मैं कोई भिखारी नहीं।
गरीब जरूर हूं साहब पर मैं कोई भिखारी नहीं।
2 वर्ष पहले
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