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पिता की छाँव

Deeksha Tiwari

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बेटियाँ कहती हैं
        
                                                    
                            
पापा मुझ पर शक करते हैं
मुझे समझते नहीं
हर चीज़ में रोक-टोक करते हैं
मुझे अपनी तरह जीने नहीं देते

पर कोई उस बूढ़े बाप के दिल को समझता है?
जिसने उंगली पकड़कर चलना सिखाया
जो खुद धूप में जला मगर छाँव हमें दी
जिसकी हथेलियों की लकीरों से भी ज्यादा
हमारी सलामती की दुआएँ भरी पड़ी हैं

वो तुम पर भरोसा करता है
पर इस बदलती दुनिया पर नहीं
उसे पता है कि रास्ते सिर्फ मंज़िल तक नहीं जाते
कुछ रास्तों के मोड़ ख़तरनाक भी होते हैं

वो रोकता है, क्योंकि वो तुम्हारी उड़ान से नहीं
हवा के थपेड़ों से डरता है
वो सवाल करता है, क्योंकि वो तुम्हारी हिम्मत से नहीं
इस बेरहम दुनिया की नीयत से घबराता है

पापा को हर बात बतानी पड़े ?
हाँ, क्योंकि वो नहीं चाहते कि
किसी अजनबी के हाथों तुम्हारी मासूमियत टूटे
वो नहीं चाहते कि जो आँसू तुम्हारी आँखों में आएँ
उनका इल्ज़ाम ज़िन्दगी के फैसलों पर लगे

वो तुम्हें घर में नहीं कैद करना चाहते
बस इतना चाहते हैं कि जब तुम लौटो
तो तुम्हारे चेहरे पर वही मासूम हँसी बनी रहे
जो पहली बार गोद में उठाते वक्त देखी थी

हाँ, वो मना करते हैं
पर उन्होंने कभी तुम्हारे सपनों पर ताले नहीं लगाए
हाँ, वो गुस्सा होते हैं
पर उन्होंने कभी तुम्हारी खुशियों पर पहरे नहीं बिठाए

बेटियाँ कहती हैं
पापा प्यार नहीं करते बस रोकते-टोकते हैं
पर कोई उस बूढ़े बाप से पूछे
जब तुम बिना बताए बाहर जाती हो
तो उसके दिल की धड़कन कैसे बढ़ जाती है
जब तुम देर से लौटती हो
तो उसकी आँखों की नींद कैसे उड़ जाती है

बेटा, वो तुझ पर हुकूमत नहीं करते
वो तुझे महफूज़ रखते है
वो तेरा उड़ना रोकना नहीं चाहते
बस तुझे गिरने से बचाना चाहते हैं

आज की दुनिया शायद इस मोहब्बत को पजेसिव कहे
पर ये मोहब्बत नहीं तो और क्या है?
10 महीने पहले
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