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कविता : करके तन्हा मुझे

Damodar Virmal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            करके तन्हा मुझे इक रोज़ चले जाओगे।
        
                                                    
                            
मुड़के देखोगे जो पीछे तो मुझे पाओगे।
क्या मेरा साथ तुझे नापसन्द आया था।
तू तो कहती थी कि मैं तेरा ही साया था। २
क्या तुम्हें गैर की बातों ने मुझसे दूर किया,
कसूर इसमें भी तुम मेरा ही बताओगे...

करके तन्हा मुझे इक रोज़ चले जाओगे।

तुम्हारे अपने ही मुझे तुमसे दूर करते थे।
हमतो इस बात को भी कहने से डरते थे।
मैं तुम्हे कहीं खो ना दूं ये फिकर सताती थी।
तुम्हारा हाल तुम्हारी ही सहेलियां बताती थी। २
हुए बदनाम हम कई बार तुझको बचाने में,
नाम इसमें भी तुम मेरा ही लगाओगे...

करके तन्हा मुझे इक रोज़ चले जाओगे।

बिगड़ता कुछ नही बस तुम मुझे समझ जाती।
जाने से पहले एक बार कुछ तो बता जाती।
वजह क्या थी मुझे इस तरह छोड़ जाने की।
क्या तुम्हें चाह थी... कुछ और पाने की। २
जानता हूँ तुम नही छोड़ोगे ज़िद अपनी,
भला मुझे नही तो और किसे बताओगे...

करके तन्हा मुझे इक रोज़ चले जाओगे।

 
2 घंटे पहले
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