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ग़रीब

Dakshal Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हां मैं ग़रीब हूं लाचार नहीं
        
                                                    
                            
हां मैं ग़रीब हूं बेईमान नहीं

रोज़ कमाता रोज़ खाता
घर, परिवार का पेट भरता

कभी सुखी तो कभी पानी
से में काम चलाता

दीपावली पार में भी दीप जलाता
एक लंगोट रोज़ पहनता

तन नहीं इज्ज़त ढकता
चुनाव में रोज़ चूल्हा जलता

वोट के बदले पैसे लेता
हां लेता हूं
पर बेईमान नहीं हूं
चोरी नहीं, गद्दारी नही

बस लेता हूं
हां कम में खुशियां ढूंढ लेता हूं

दुख का क्या कभी भी याद कर लेता हूं
कम कपड़े, कम भोजन

छोटा घर थोडी सुविधा
हां पर स्वाभिमान से रहता
हूं।

दक्षल कुमार व्यास

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