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फर्क कहां

Dakshal Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पसीने की बूंदे सुख गई खेतों में
        
                                                    
                            
हाथ मेले हुए काले धन में
मीठी ये जली रोटियां चूल्हे की
ठंडे ये गले सूखे ब्रेड पैकेट के
सूखे ये आसमान खेतों पर
बरस रहे फव्वारे मेदानों पर
राते आसमान के नीचे दिन निकले पेड़ों से
प्रकृति के समीप रहने से, गरीबी का एहसास न हुआ
AC के बंद कमरों में हुआ एहसास अमीरी का
नुकसान हुआ प्रकृति का
मेहनत में दिन सारा बीत गया चैन की नींद आई खटिए पर
व्यस्तता में बिता दिन सारा बैचेनी में बीती रात स्लीप वेल के गद्दी पे
डब्बे में सिक्के ,नोट फटे गले 2000 रुपए
इंतजाम हुआ राशन का सुकून मिला महीने का
डेबिट क्रेडिट में उलझ गए राशन का कोई पता नहीं
पता चला राशन का लाने वाले का कोई पता नहीं
निकला एक वर्ष दो धोती में खर्च हुए पगड़ी पे
बांधे साफा इज्जत का सरताज लिए
निकला एक वर्ष 365 कटे कपड़ों में
खर्च हुए बाहरी पहनावों पे
बांधे मुखौटा अभिमान का नजराना लिए।

दक्षल कुमार व्यास
 
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