इस बेचैन मन को आज है स्वीकृति,
ठेलता यूँही बोझ अप्राप्ति की अपकीर्ति का,
भुला देगा आज देखो वो अतीत की स्मृति,
चूंकि परोक्ष बैरी है ये आज की सुकीर्ति का।
आज चित्त को हो गई कैसी ये आत्मतुष्टि,
तिमिर में दीप्ति सी, काली घटाओ की बिजली,
देख आज बरस आई अन्तर्मन में भी वृष्टि,
अब दृगों को खोल देखूं धरती सुनहरी सजली।
स्वप्रेम में पड़ी बाधाएं, उनको मेरा प्रणाम,
कोमल स्वरों में पिरोई जो ये मैंने कविता-कृति,
उनको देती तिलांजलि व पूर्ण करती काम,
देकर सम्मानपूर्वक अवनति को- मेरी स्वीकृति।