आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

चूंकि परोक्ष बैरी है ये आज की सुकीर्ति का।

                
                                                         
                            इस बेचैन मन को आज है स्वीकृति,
                                                                 
                            
ठेलता यूँही बोझ अप्राप्ति की अपकीर्ति का,
भुला देगा आज देखो वो अतीत की स्मृति,
चूंकि परोक्ष बैरी है ये आज की सुकीर्ति का।

आज चित्त को हो गई कैसी ये आत्मतुष्टि,
तिमिर में दीप्ति सी, काली घटाओ की बिजली,
देख आज बरस आई अन्तर्मन में भी वृष्टि,
अब दृगों को खोल देखूं धरती सुनहरी सजली।

स्वप्रेम में पड़ी बाधाएं, उनको मेरा प्रणाम,
कोमल स्वरों में पिरोई जो ये मैंने कविता-कृति,
उनको देती तिलांजलि व पूर्ण करती काम,
देकर सम्मानपूर्वक अवनति को- मेरी स्वीकृति।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
1 hour ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर