ज़िंदगी के मायने समझने की
साथ में दो कदम चलने की
अब जरूरत नहीं लगती
गलत को जायज ठहराने की
हर बात पर हामी भरते जाने की
अब जरूरत नहीं लगती
इंतजार में रातों को जागने की
उलझनों से कोसों दूर भागने की
अब जरूरत नहीं लगती
बेपरवाही से दर्द में डूबने की
अकेले हालात से जूझने की
अब जरूरत नहीं लगती
ये सब हुआ जब दिल ने कहा
सब्र का प्याला अब भर चुका
ग़ैरों से सहानुभूति पाने की
हमदर्दी और दया उठाने की
अब जरूरत नहीं लगती
-चित्रा