विज्ञापन

शर्मसार हुई इंसानियत

मनोज कुमार

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बात बस इतनी नही, खराब हो गयी नियत।
        
                                                    
                            
ये कैसी तलब है, जो देख नही पाती मासुमियत।
आज एक घटना से, फिर शर्मसार हुई इंसानियत।

वो चिखा होगा..
वो चिल्लाया होगा...
अपने बचाव को हाँथ पैर झटकारा होगा।
जाहिर है माँ-माँ पुकारा भी होगा।

तब बेरहमी से, उसके मुँह को हाँथों से दबाया होगा
उसने खामोश करने को शायद मारा भी होगा।
जैसे तैसे जबरजस्ती के हुक खोली होगी
फिर पैंट उतारा होगा।

और आगे....
आगे जो सोचकर रोंगटे खड़े हो जा रहे
उसने अंजाम दिया होगा।

कैसे एक इंसान के रूप मे,
अपनी सब सिमाँये लांघ रहा हैवानियत।
आज एक घटना से, फिर शर्मसार हुई इंसानियत।

कितने माँ-बाप के ज़हन ये डर रह गया
महफुज के नाप पे बस अब घर रह गया

सिमटा दिया पर खुलने से पहले आशमां।
जिन्हे गगन चुमना था,
वो असमंजस मे है जये ते जाये कहाँ ?

नन्हे आँखों मे आँसु देके ओंठो से हसी ले ली।
तुमने अपने महस कुछ पलो के लिये,
कितनो की जिन्दगी ले ली।

खिलने से पहले कलियों की खतरे मे है मासुमियत।
आज एक घटना से, फिर शर्मसार हुई इंसानियत।

- मनोज कुमार साँझ

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
8 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Anil Kumar

4215 कविताएं

View Profile

Priyanshu Saini

1 कविता

View Profile

N manglam

371 कविताएं

View Profile

Gurdeep Singh

143 कविताएं

View Profile