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बालमन के सवाल

अंकिता सिंह

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी सुना है किसी
        
                                                    
                            
अजन्मी कली के भीतर
बीज का पल्लवित हो जाना!!

कभी सोचा है उस मासूम के
मन में उठते सवालों के
बवंडर का जवाब!!

कभी महसूस किया है
उस दर्द को जो उसे
जीना होना भविष्य में!!

कभी समझने की कोशिश
की है वह भयावह स्थिति
जब किसी निर्बोध के मन
और शरीर में आजीवन के लिए
रोप दी गयी हो डर
और दहशत की फसल!!

नहीं किया तो अब भी वक़्त है
समझो शब्दों की गंभीरता को
वरना हो सकता है कि
भविष्य के गर्भ में छुपा कोई
ऐसा ही हादसा तुम्हें छोड़ जाये
पछतावे और आत्मग्लानि के
थपेड़ों के बीच।

माँ,तुम तो जननी हो न,
फिर तुम कैसे नहीं समझ पाती
कैसे समाज और मासूमियत के बीच
तुम चुन लेती हो समाज़ को और
चुप रह जाती हो,
कैसे तुम्हारा मन नहीं धिक्कारता तुम्हें!
कैसे मुँह फेर अनभिज्ञ होने का दिखावा
कर लेती हो!
मासूमियत को दांव पर लगा,
पीड़ा में छोड़
कौन सी इज़्ज़त की दुहाई
देती फिरती हो मुझे
तुम इस निर्मोही समाज के लिए !!

बेहतर था मैं आती ही न
इस दुनिया में और
न बनती इस दोगले भावहीन
समाज का हिस्सा।
संस्कार और संस्कृति के
नकाब के पीछे भी है इस
समाज का एक चेहरा,
कुरूप, कुंठित, वीभत्स।।

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।

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