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प्यासी धरा

Chhabi Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सदियों से छलनी किये हैं देखो सीने को
        
                                                    
                            
फिर भी न छोड़ रहे मुझे अब जीने को
जिसने ही जन्म दिया है आज देखिये
रख दिए जहर उसे ही आज पीने को

हल भी चलाया मेरे तन को चीर कर
अन्न उपजा दिया खुद प्यासी रहकर
खा रहे है अन्न मेरा हाल इनसे पूछिये
ख्याल मेरा जरा इन्हीं से ही पूछिये

धरा में धरा है क्या बोलते हैं ये जुबान
इनके दिलो में न रहम की गुंजाइस है
तोड़ फोड़ करते ,मेरे घर को उजाड़ते
कहते है भार मुझे ,तू ही बन छायी है

सुहाग को मिटाकर मेरे हँसते हैं देखो
कैसी ये बिपदा मैंने अपनों से पायी है
काट दिए सारे वन को मेरे तन से ही
कहते है सब ये कलयुग की दुहाई है

तन से अंगार फूटे मन से मलाल फूटे
लगता है मैने सारे कुपुत्र ही जन्माई है
इससे तो अच्छा होता बाँझ ही होती मैं
माँ के कलेजे पसीझ आँख भर आयी है

आँचल में रख नीर बनी थी सदा अधीर
प्यास अपने सूत की कहाँ माँ सह पायी है
झट अपने पट खोलती उड़ेलती हूँ नीर देखो
भले ही मेरे तन को फिर प्यास लग आयी है

काहे क्रूर इतने तुम बन गए सुनो हे लाल
तुमको जरा सी मेरी ममता न याद आयी है
सुखा दिए तन के सारे सुराख़ को अब
तुम्हे क्या पिलाऊँ मुझे चिंता घेर आयी है

धरा से गर खत्म होगा पानी का राज तब
पियोगे क्या तब तुम्हे फिकर कब आयी है
जीवन जो तुम जीना और चाहते हो भला
बूँद बूँद बचाने का कोई जतन कर पायी है

जहाँ देखो फिजूल खर्च करते हो ,आज भी
कल के भंडार फिर जब बोतल से पाओगे
लाख दौलत भर ले तू अपनी तिजोरी में आज
कल तो बिन पिए पानी से ही मर जाओगे

आँख खोल आज नहीं कल कहाँ जल होगा
नभ् से नहीं फिर कोई फरियाद होगा
धीरे तू जाग कर उठा ले गर ये कदम तो
जीवन नहीं तेरे जल से अवसान होगा

छबिराम यादव  छबि 
13/05/2019
लोटाढ, मेजा रोड, प्रयागराज 


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