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सागर कहता है

Chess and

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सागर कहता है सरिता से
        
                                                    
                            
अब न मुझसे मिला करो।
तोड़ मौन चट्टानों संग
थोड़ा तुम भी गिला करो।

वजूद तुम्हारा कुछ धूमिल सा
बैठ आज फैसला करो।
पाकर तनिक संवेदी स्वर को न
फूल की मानिंद खिला करो।

इक कमसिन सी जलधारा हो
यूं ही ना तुम बहा करो।
इठलाई सी सुंदरता यह
पत्थर संग ना रहा करो।

धिक्कार रहा है तुमको इंसा
ऐसे मुँह न सिला करो
बांध देख क्यों सहमी तुम
तटबंध तोड़ सब बयां करो ।

नूर नहीं है लहरों में अब
मैला आंचल धुला करो।
सीप , शंख का लिए खजाना
द्वार न अपना खुला करो।

नई नवेली घर से निकली
प्यासी तुम ना रहा करो
प्रेम की बहती जल चादर हो
नए लिबास तुम सिला करो ।

सागर कहता है सरिता से
अब ना मुझसे मिला करो।
तोड़ मौन चट्टानों संग
थोड़ा तुम भी गिला करो।
-माधुरी महाकाश
2 वर्ष पहले
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