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मोबाइल संग तुम

Chess and

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पीठ पीठ से बातें करती
        
                                                    
                            
मोबाइल संग तुम सो जाते
सन्नाटे की चौखट पर बैठे
हम खुद से हैं बतियाते

कहाँ गयी वह रात सुहानी
"छाया गीत" सुना करते थे
लेकर हाथ एक दूसरे का
कितनी बातें हम करते थे।

नहीं खिलखिलाकर अब हंसते हो
नहीं छेड़ते कोई तराना
एकाकीपन के मनमीत मेरे
भूल गए हो दिल बहलाना।

साथ रह रहे अनजाने से
पर पहचान पुरानी है अपनी
नयन नयन से बात न करते
नई कहानी है अपनी।

तन का मेल नहीं है प्रियतम
मन, प्राणों सँग बाँधा है।
यद्यपि समझ सके न तुम
मैंने अमर प्रेम को साधा है।

है कविता कोई , नहीं मनोरम
दिल की धड़कन का गीत वही
कभी बैठ तुम खो जाते थे,
ध्वनित हो रहा संगीत वही।

- माधुरी महाकाश
एक वर्ष पहले
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