छोटे-छोटे हमलों में,
हम क्यों हर बार सहें?
जब आग उधर से आती है,
तो हम चुप क्यों रहें?
पाक ने तो इतिहास रचा है,
धोखे का व्यापार किया,
'71 में भी टुकड़े हुए,
फिर भी ना इक़रार किया।
क्या अब बस छोटे एयर-स्ट्राइक से,
वो अपने फितरत से हटेगा?
जो वर्षों से आतंक उगाता है,
क्या वो एक वार से डरेगा?
POK की हर सुबह हमें,
क्यों बिन सूरज के जलाती है?
और दिल्ली की चुप्पी हमें,
अधूरे सपनों में सुलाती है।
नीति कहाँ है, नीति कहाँ?
क्या कोई योजना भी बनेगी?
या हर शहादत के बदले में,
बस मोमबत्ती ही जलेगी?
हमें गर्व है वीरों पर,
पर ग़ुस्सा है उस सोच पर,
जो केवल निंदा लिखती है,
हर ताज़ा खून की खोज पर।
कब तक सीमाओं की रक्षा में,
हम बेटे खोते जाएँगे?
POK को लेने का संकल्प,
क्या सिर्फ नारे ही रह जाएँगे?
और भीतर जो बैठे हैं दुश्मन,
घुसपैठ की शक्ल में, छुपे हुए—
उन्हें कब तक सहन करेंगे?
अब आंतरिक मोर्चा भी सधे हुए।
हर घुसपैठिए को निकालो,
जो हमारे लहू से खिलता है।
राष्ट्र की रक्षा सिर्फ सीमा नहीं,
हर गली-कूचे में मिलती है।
-चन्दन कुमार विश्वास