उसे धर्म नहीं, अपना विवेक चुनने दो
उससे यह मत कहो—
“तुम स्त्री हो, इसलिए मानो।”
उससे पूछो
“तुम मनुष्य हो
तुम स्वयं क्या मानती हो?”
ऋग्वेद की ऋषिकाएँ
मंत्रों में अपनी आवाज़ छोड़ गईं,
गार्गी ने दर्शन के प्रश्न उठाए,
मैत्रेयी ने धन से ऊपर
ज्ञान को चुना
तो फिर स्त्री की बुद्धि पर
किस अधिकार से पहरा?
गीता के शब्दों में
मोक्ष का द्वार
स्त्री के लिए बंद नहीं
वह भी परमगति की अधिकारी है।
क़ुरआन ने भी कहा
विरासत में स्त्री का हिस्सा है,
और उसे उसकी इच्छा के विरुद्ध
“विरासत” की वस्तु बनाना उचित नहीं।
बाइबल कहती है
नर और नारी, दोनों
ईश्वर की छवि में बनाए गए;
और पौलुस लिखता है
“न पुरुष, न स्त्री
मसीह में सब एक हैं।”
बुद्ध की परंपरा में
थेरीगाथा की स्त्रियाँ
अपनी जागृति स्वयं लिखती हैं
उनकी मुक्ति किसी पुरुष की
अनुमति पर निर्भर नहीं।
और गुरु नानक पूछते हैं
जब स्त्री से जन्म लेते हैं
मनुष्य, राजा और पीढ़ियाँ,
तो फिर उसे बुरा क्यों कहें?
फिर मैं सोचता हूँ
अगर धर्म सच है,
तो प्रश्नों से उसे डर क्यों?
अगर ईश्वर सत्य है,
तो एक स्त्री की स्वतंत्र बुद्धि
उसके लिए ख़तरा क्यों?
और अगर किसी विश्वास को बचाने के लिए
स्त्री की आवाज़ दबानी पड़े
तो बच क्या रहा है
धर्म, या सत्ता?
मैं स्त्री से यह नहीं कहता
“धर्म छोड़ दो।”
मैं उससे बस इतना कहता हूँ
धर्म चुनना हो तो चुनो,
न चुनना हो तो मत चुनो;
प्रार्थना करनी हो तो करो,
प्रश्न करना हो तो करो।
क्योंकि जन्म
किसी धर्म का प्रमाण नहीं,
और भय
किसी ईश्वर का प्रमाण नहीं।
एक स्त्री का विवेक
किसी शास्त्र से छोटा नहीं होना चाहिए।
उसे मंदिर जाने की आज़ादी हो,
मस्जिद जाने की आज़ादी हो,
गिरजाघर जाने की आज़ादी हो,
गुरुद्वारे जाने की आज़ादी हो
और उतनी ही आज़ादी
न जाने की भी हो।
क्योंकि सशक्त स्त्री वह नहीं
जिसे मैंने एक धर्म से निकालकर
दूसरे धर्म में पहुँचा दिया।
सशक्त स्त्री वह है
जो अपने जीवन के सामने
खुद खड़ी होकर कह सके
“मेरा शरीर मेरा है,
मेरी बुद्धि मेरी है,
मेरी अंतरात्मा मेरी है
और मेरे विश्वास का निर्णय भी
मैं स्वयं करूँगी।”
शायद यही असली मुक्ति है
ईश्वर को नकारना नहीं,
ईश्वर को मानने की स्वतंत्रता भी
और न मानने की स्वतंत्रता भी
एक समान रखना।
क्योंकि जिस दिन
एक स्त्री को अपने विश्वास के लिए
किसी की अनुमति नहीं चाहिए होगी
उस दिन धर्म छोटा नहीं होगा,
मनुष्य बड़ा हो जाएगा।