ये तन्हाई और फिर तेरा ख्याल।
आँखों में आँसू और तेरा रुमाल।।
तेरी घनी जुल्फों के वो साये।
कि मेरे जीने का फिर सवाल।।
शाम होते ही काम आ जाते है।
तेरे सुनहरे ख्वाब वो बेमिसाल।।
कितने नासमझ जो समझ न पाते।
तेरी खामोश निगाह के वो सवाल।।
लाखों है तैयार यूहीं कत्ल होने को ।
जाने कैसे कर देते हो ये कमाल।।
न वो कुछ कह पाए और न हम।
इस बात का रहा गुमनाम मलाल।।
- बृज मोहन सिंह बिष्ट