अंदाज़ अल्फाजों के नये निकल जाते हैं।
हमसे ही रुख हवाओं के बदल जाते हैं।।
डरते है तो हम लोग यहां सिर्फ फ़ूलों से।
आके तेरी आगोश मे हम पिघल जाते है।।
इन बेदर्द ज़ख्मों की किसे हैं यहां फ़िकर।
बनके आँसू ये भी शराब मे घुल जाते हैं।।
कब तक लेंगे सब मजा रूसवाईयों का।
वक़्त के साथ लोग हर बात भूल जाते हैं।।
यू न करो बेवजह शोर अपनी बुलंदियों का।
नदियों को ही यहां समन्दर निगल जाते हैं।
जिंदगी का उसूल है वो तो चलती रहेगी।
बस लोग बदलते हैं सफ़र बदल जाते हैं।।
कभी तो मिलेगा सकूं गुमनाम सहराओं मे।
चश्मा ए पानी तो यहां भी मिल जाते हैं।।
-बृज मोहन सिंह बिष्ट