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नीले आसमां को भी

Brajesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नीले आसमां को भी है दर्द थोड़ा सा कहीं
        
                                                    
                            
छुपा रखा है उन्हें काले बादलों में कहीं
वो बरसते हैं जो बूँद बनकर के कभी
है संभालती उन्हें आँचल में ज़मीं
कहे तो कहे किस से ही वो भला
रहा ख़ुद उसे सूरज जला
ना चाँद न तारे ही उसके हुए
पर नज़र कहां आती किसी को उसकी ख़ला
है तड़पता वो भी दिन रात है
ग़म बाँटने को पर न कोई साथ है
कैसा है क़ुदरत का इंसाफ़ ये
खुशियां बांटने वाला ही ख़ाली हाथ है
पर गिला भी करे तो कैसे करे
इसमें भी तो उसकी तौहीन है
अनगिनत नगीने जिसके दामन में लगे
क्या वो भी इतना दीन है
इन्हीं कश्म-ओ-कश में बेचारा जी रहा
बयाँ नज़रों से भी कर सकता नहीं
नीले आसमां को भी है...।
एक महीने पहले
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