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कैसे ही कटेगा यह जीवन

Brajesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इस आसमां के वीराने में
        
                                                    
                            
जहां ना चाँद सितारे भी मेरे
कैसे ही कटेगा यह जीवन
हे मां ममता के बिन तेरे।
यूं तो ज़मीं विशाल ये है अपनी
हैं लोग जाने पहचाने से
पर कहां स्नेह की वो गंगा
करे मुक्त जो ज़ख्मों से दुःख और ताने के
छूटा जीवन का ध्येय भी अब
टूटे सपने बिखरी राहें
है कौन सी ही मंज़िल अब मेरी
जहां कोई रस्ता देख रहा हो खोले बाँहे
ये सफ़र चलेगा अब कैसे
जब बस घनघोर अंधेरे संग मेरे
कैसे ही कटेगा यह जीवन...।
2 सप्ताह पहले
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