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दूर से दिखते जो मंजर सुहाने लगते हैं

BRAJESH KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            दूर से दिखते जो मंजर सुहाने लगते हैं
        
                                                    
                            
पास आते ही वही डराने लगते हैं
हे मोहब्बत तो रहेगी कायम हरदम
याद आता वही जिसे भुलाने लगते हैं
दिल में जज्बात चाहत ही न हो कोई
जो भी अपने हों वही बेगाने लगते हैं
क्या गुजरती है किसी पर कोई जाने कैसे
नज़र के सामने आये मुस्कुराने लगते हैं
जीते जी रहते हैं अपनी कदर से महरूम
बाद जाने पर खूबियां गिनाने लगते हैं
ग़म ए ज़ीस्त से बचकर जिया कौन " वफ़ा"
दूर जाने से बेहद क़रीब आने लगते हैं
2 घंटे पहले
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Sanjai kumar

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