क्षण-क्षण
दुख देकर,
और मिले हुए दुखों से
भीतर ही भीतर
कराहते, विलाप करते हुए
परिपक्व होता यह संसार
काल की शिला पर
बस एक ही पाठ
उकेरता जाता है:
मनुष्य-जीवन की पीड़ा का
एकमात्र उपचार
पीड़ा ही है।