क्षण-क्षण
दुख देकर,
और मिले हुए दुखों से
भीतर ही भीतर
कराहते, विलाप करते हुए
परिपक्व होता यह संसार
काल की शिला पर
बस एक ही पाठ
उकेरता जाता है:
मनुष्य-जीवन की पीड़ा का
एकमात्र उपचार
पीड़ा ही है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X