एक बूंद समंदर है
नैनो में ठहरे तो,
गालों पर जब ढलके
दरिया बन जाती है।
जब अल्फ़ाज ज़ुबा
की बंदिश हो,
खामोशी बाते करती है।
जब ज़ुबा पर
कोई पहरा न हो,
हर्फ़ कहर बरपाती है।
नज़्मों की
उलझी डोरी ने,
शाखों की खार को जकड़ा है।
ये लोग भला क्यों जानेगे,
जब दरख्त ही उफ़ न करती हो।
- विनीता शाहा