विज्ञापन

जब दरख्त ही उफ़ न करती हो।

BINITA SAHA

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक बूंद समंदर है
        
                                                    
                            
नैनो में ठहरे तो,
गालों पर जब ढलके
दरिया बन जाती है।

जब अल्फ़ाज ज़ुबा
की बंदिश हो,
खामोशी बाते करती है।
जब ज़ुबा पर
कोई पहरा न हो,
हर्फ़ कहर बरपाती है।

नज़्मों की
उलझी डोरी ने,
शाखों की खार को जकड़ा है।
ये लोग भला क्यों जानेगे,
जब दरख्त ही उफ़ न करती हो।
- विनीता शाहा
2 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

RATAN KUMAR

787 कविताएं

View Profile

Ejaz Ahamad

122 कविताएं

View Profile