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काम काजी मां की ममता

BINITA SAHA

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी कभी मेरा काम काजी होना
        
                                                    
                            
मुझे बहुत सालता है
मेरी ममता मेरे मन के किसी कोने में दमित होती है
और कभी कभी अकुलाहट
इतनी बढ़ जाती है कि आँखें नम हो हो जाती है
मुझे बहुत कचोटता है ,
जब सुबह सुबह मैं जगाती हूँ अपने तनय को
की देख लू उसका चेहरा और वो मुझे देख ले
कुछ मैं कह लूं कुछ वो कह ले ,,,,,,,,,,,,
थोड़ा इतराना थोड़ा इठलाना,मेरे गले से लिपटना
मेरे गोद मे सर रखना दुलारने की चाहत लेकर
परन्तु ,,,,,
मेरा उसको याद दिलाना की ,समय हो गया अब मुझे जाना होगा,
उसकी आँखों से सुनहरे मोती ढलक पड़ते हैं और मेरा सीना छलनी कर जाते हैं
पाव में अदृश्य बेड़िया पड़ जाते है बोझिल मन से
अपनी ममता को वही कहीं तहखाने में छोड़ आती हूँ
और फिर,,,,,,,,,,,,,,,,,
दोपहर लंच को बैठती हूँ तो फिर मन अकुलाता है
उसने अपना लंच खाया होगा कि नही ,क्या भूखा ही होगा ,मैं कैसे खा लूं ?
कल भी मैंने जब उसके स्कूल बैग को टटोला तो
लंच बॉक्स पूरा भरा हुआ ही था ।
फिर शाम,,,,,,,,,,
जब मैं लौटती हुँ घर तो वो मेरे पायल की रुनझुन पहचान लेता है दूर से ही,
सीढ़ियों से दौड़ा आता है ,जैसी उसकी सांसे मुझ में
अटकी हो ,
माँ कह कर ऐसे लिपट जाता है जैसे बरसो बाद मिला हो मुझसे ,
और मुझे भी मिल जाती है एक मुकम्मल दुनिया
मेरी दुनिया,,
- विनीता शाहा
एक वर्ष पहले
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