पृथ्वी का अद्भुत भूखंड,
शिवमय है जिसका हर कालखंड।
अधीनस्थ शिव के मापदंड,
अवनि, अंबर और मार्तंड।।
शिव-त्रिशूल पर जो धारित,
पुराणों में है उच्चारित।
अविमुक्त और अविनाशी,
प्राचीनतम शहर है काशी।।
स्पर्श-रत्न कहें या पारस,
संपर्कित होते ही बनारस।
अंतर्निहित गुण आते निखर,
छू लेता हर शख़्स शिखर।।
माँ गंगे हर जगह पवित्र,
जीवनदायिनी, जैविक मित्र।
काशी में हो उत्तर-वाहिनी,
केवल यहीं हैं मोक्षदायिनी।।
काशी रूप अध्यात्म-दात्री,
मोक्ष, ज्ञान, भक्ति की धात्री।
संगीत, संस्कृति और संस्कार,
काशी में पाते हैं प्रसार।।
काशी-क्षेत्र होते ही शुरू,
हर व्यक्ति हो जाता 'गुरु'।
संबोधन का आम सलीका,
क्रोध-प्रेम में रहता टिका।।
बनारस भरता अलग ही रस,
हो जाते नीरस भी सरस।
बनारसीपन का जुटते अंश,
अल्हड़पन का लगता डंश।।
फ़ेंकू, फ़क्कड़, हवाबाज़,
बनारसी का अल्हड़ अंदाज़।
चाय-पान के बनते भुक्खड़,
मुँह में पान, हाथ में कुल्हड़।
मोड़, अड्डा या हो नुक्कड़,
हाथ में आते चाय का कुल्हड़।
उपदेश की केतली खुल जाती,
थेथरोलॉजी की चीनी घुल जाती।।
सरस्वती होतीं जिह्वा सवार,
वाणी बनती दर्शन की धार।
ज्यों ही चाय हलक तक जाए,
या पान की पीक बाहर आए।।
मोदी, ट्रंप करते शीर्षासन,
पानी भरता स्थानीय शासन।
खुली बहस होती यहाँ आम,
क्यों बढ़े, क्यों घटे दाम।।
मिलते बनारस और काशी,
अलग लगती अब वाराणसी।
शांति, अल्हड़पन दोनों गुम,
शहर में लोगों का हुजूम।।
तीर्थयात्री और व्यवसायी,
या देश-विदेश के अध्येता-ध्यायी।
राजस्व-संग्रह, रोज़गार-सृजन,
सरकार का बना मुख्य विज़न।।
अल्हड़पन, अध्यात्म ख़तरे में,
खो रहा विकास के गजरे में।
घाट अशांत, चौड़ी गलियाँ,
वाराणसी ने काशी की उड़ाईं धज्जियाँ।
— विजय बहादुर तिवारी