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नंगा नाच रही महंगाई

BIJAY TIWARI

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मंदी का छा रहा तिमिर,
        
                                                    
                            
मुद्रा का गया भाव गिर।
जीडीपी पर बढ़ा दबाव,
बढ़ गए वस्तुओं के भाव।
खरीदारी,बचत में कमी आई,
खर्च रुपया, पाई कमाई।
नंगा नाच रही महंगाई।।

समेकित-महंगाई का भूचाल,
मूल्यों में अनवरत उछाल।
हर वस्तु चली तेल की चाल,
है आम जन का बुरा हाल।
दलाल चाटते खूब मलाई,
खर्च रुपया, पाई कमाई।
नंगा नाच रही महंगाई।।

मुफ्तखोरी, कहीं कर-भार,
कर्महीनता के ये पैरोकार।
भ्रष्टाचार बैठा बन भस्मासुर,
जनता को जलाने को आतुर।
स्वयं मोहिनी रूप अपनाई,
खर्च रुपया, पाई कमाई।
नंगा नाच रही महंगाई।।

मिलती नहीं सेवा सरकारी,
चरम पर है बेरोजगारी
बेरोजगारों की सिसकारी,
नहीं सुनते मंत्री-अधिकारी।
आश्वासनों से झूठी भरपाई।
खर्च रुपया, पाई कमाई।
नंगा नाच रही महंगाई।।

पांच साल पर आते मदारी,
दिखाने करतब बारी-बारी।
नेताओं की गिरगिटी भाषा,
प्रजातंत्र का नग्न तमाशा।
चीर-हरण खुद करते कन्हाई,
खर्च रुपया, पाई कमाई।
नंगा नाच रही महंगाई।।

महंगाई में सुन 'मन की बात',
दिल पर लगता है आघात।
कोरे आश्वासन, झूठ, प्रपंच,
सजा इनसे हर दल का मंच।
मुफ्त रेवड़ियों की बन आई,
खर्च रुपया, पाई कमाई।
नंगा नाच रही महंगाई।।

आजादी-आजादी दे नारा,
अराजकता को जा रहा संवारा।
परिजनवाद का भौकाल,
जाति-धर्म मिल ठोकें ताल।
मत-अधिकोष न जाए गुर्राई,
खर्च रुपया, पाई कमाई।
नंगा नाच रही महंगाई।।
– बिजय बहादुर तिवारी '
 
एक महीने पहले
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