विज्ञापन

ये शहर है आशियाना

Bhuneshwar Anant

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ये शहर है आशियाना,
        
                                                    
                            
ना समझना तुम इसे फँसाना,
यही तो है मंज़िल का तराना,
क्यों करता है रे बहाना॥

देख ज़रा उन समंदर की लहरों को,
कभी इन्हें ना मापना पैमानों में,
मन में ना उठाना तू सवाल,
खो जाना उन सपनों में॥

बड़ी शिद्दत से आज मिली आज़ादी है,
अब ना सोच तू बर्बादी,
गिले-शिकवे भूल जा,
बना ले विचारों को फौलादी॥

ना बहका तू मन को,
खड़ा कर ले तन को,
नहीं मिलेगा ऐसा जीवन दोबारा,
ये शहर है अब जीने का सहारा॥
ये शहर है आशियाना,
ना समझना तुम इसे फँसाना॥
- भुनेश्वर अनंत
एक घंटा पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Manoj Kumar

428 कविताएं

View Profile

Anil Pandey

451 कविताएं

View Profile